ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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उत्तर प्रदेश में गोवध निवारण कानून के तहत कार्रवाई के कई मामले सामने आते रहे हैं, लेकिन इस बार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में बेहद साफ और कड़ा संदेश दिया है, जिसमें प्रशासन ने शक के आधार पर वाहन जब्त कर लिया था.
कोर्ट ने कहा कि जब तक यह वैज्ञानिक तरीके से साबित न हो जाए कि बरामद मांस वास्तव में गोमांस है, तब तक वाहन जब्त करना अवैध और मनमाना माना जाएगा.
यह मामला
बागपत जिले से जुड़ा है, जहां अक्टूबर 2024 में पुलिस ने एक वाहन को इस संदेह
में पकड़ लिया था कि उसमें प्रतिबंधित मांस ले जाया जा रहा है. बाद में जिला
प्रशासन ने जून 2025 में वाहन जब्ती का आदेश भी दे दिया.
वाहन मालिक ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी और कहा कि पशु
चिकित्सक की रिपोर्ट में मांस के गोमांस होने की पक्की पुष्टि नहीं थी, बल्कि उसे केवल संदिग्ध बताया गया था.
कोर्ट ने क्या कहा
सुनवाई
के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी नागरिक की संपत्ति पर
कार्रवाई करने से पहले प्रशासन के पास ठोस, वैज्ञानिक और कानूनी आधार होना चाहिए.
कोर्ट की टिप्पणी साफ थी कि सिर्फ आशंका, संदेह
या अधूरी रिपोर्ट के आधार पर वाहन सीज करना कानून के दायरे में सही नहीं ठहराया जा
सकता.
अदालत ने
न केवल जब्ती आदेश को गलत माना, बल्कि राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को 2 लाख रुपये
हर्जाना देने का भी आदेश दिया.
साथ ही, रिपोर्टों के मुताबिक कोर्ट ने यह भी
कहा कि यदि सरकार चाहे तो इस हर्जाने की रकम जिम्मेदार अधिकारियों से वसूल सकती
है.
फैसले का बड़ा मतलब
यह फैसला
सिर्फ एक वाहन मालिक को राहत देने तक सीमित नहीं है. यह प्रशासनिक कार्रवाई की
जवाबदेही तय करने वाला आदेश माना जा रहा है.
इससे साफ संकेत गया है कि कानून का इस्तेमाल साक्ष्य के आधार पर
होना चाहिए, न कि अनुमान के आधार पर.
इस आदेश का असर आगे आने वाले ऐसे मामलों पर भी पड़ सकता है, जहां पुलिस या प्रशासन पहले कार्रवाई कर देते हैं और बाद में प्रमाण जुटाने की कोशिश होती है. हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले में प्रक्रिया और प्रमाण, दोनों को अहम माना है.
रिपोर्टों में यह साफ हुआ
कि कोर्ट ने राज्य की कार्रवाई पर सख्त रुख अपनाया है और मुआवजे का आदेश दिया है.
इस फैसले को यूपी में गोवध कानून से जुड़े मामलों में एक अहम कानूनी
मिसाल के रूप में देखा जा रहा है
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