ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव की तारीखों को लेकर अनिश्चितता बढ़ने के बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंचा। याचिका में मांग की गई कि चुनाव समय पर कराए जाएं और राज्य निर्वाचन आयोग इस पर साफ जवाब दे।
कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए पूछा कि क्या आयोग तय संवैधानिक समयसीमा के भीतर चुनाव कराने की स्थिति में है।
रिपोर्टों
के मुताबिक ग्राम पंचायतों और अन्य पंचायत निकायों का कार्यकाल 2 मई 2026 को समाप्त होना था।
ऐसे में अदालत ने संकेत दिया कि चुनाव प्रक्रिया अनावश्यक रूप से
टलनी नहीं चाहिए और संविधान की मंशा के अनुरूप समय पर नई व्यवस्था आनी चाहिए।
कोर्ट ने क्या कहा
सुनवाई
के दौरान हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 243E का हवाला महत्वपूर्ण माना, जिसमें पंचायतों की अवधि
पांच साल से अधिक न होने की बात कही गई है।
अदालत ने पूछा कि अधिसूचना और तैयारी के स्तर पर सरकार और आयोग की
वास्तविक स्थिति क्या है।
कुछ
रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि कोर्ट ने कहा कि पंचायत चुनाव 26 मई 2026 तक या उससे पहले संपन्न होना चाहिए।
यह टिप्पणी बताती है कि अदालत सिर्फ औपचारिक जवाब नहीं, बल्कि स्पष्ट समयबद्ध कार्रवाई चाहती है।
सरकार और आयोग की भूमिका पर सवाल
राज्य
निर्वाचन आयोग की ओर से यह दलील रखी गई कि चुनाव तिथियों की अधिसूचना जारी करने की
अंतिम जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है और आयोग परामर्श देता है।
यहीं से यह सवाल और बड़ा हो जाता है कि आखिर देरी का वास्तविक कारण
किस स्तर पर है।
गांवों
की राजनीति में पंचायत चुनाव का महत्व बहुत बड़ा होता है। प्रधान, क्षेत्र पंचायत और जिला
पंचायत स्तर की सत्ता स्थानीय विकास, योजनाओं और सामाजिक
संतुलन से सीधे जुड़ी होती है।
इसी वजह से चुनाव की तारीखों पर बनी असमंजस की स्थिति सिर्फ
प्रशासनिक मसला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का
मुद्दा भी है।
ताज़ा अपडेट
उपलब्ध
रिपोर्टों के अनुसार हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से समयबद्ध तैयारी पर स्पष्ट जवाब
मांगा और आगे की सुनवाई भी तय की।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और आयोग मिलकर पंचायत चुनाव का
कार्यक्रम कब और कैसे अंतिम रूप देते हैं।
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