पूजा पाल बनीं भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष, संघर्ष, राजनीति और इंसाफ की लंबी लड़ाई की कहानी
समाजवादी पार्टी से निष्कासित विधायक पूजा पाल को भाजपा ने उत्तर प्रदेश का प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया है। जानिए राजू पाल हत्याकांड, अतीक अहमद से राजनीतिक संघर्ष और पूजा पाल के पूरे राजनीतिक सफर की कहानी।
पूजा पाल बनीं भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष, संघर्ष, राजनीति और इंसाफ की लंबी लड़ाई की कहानी
  • Category: उत्तर प्रदेश

समाजवादी पार्टी से निष्कासित विधायक पूजा पाल को भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश का प्रदेश उपाध्यक्ष नियुक्त किया है। यह नियुक्ति केवल एक राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष, व्यक्तिगत त्रासदी और राजनीतिक उतार-चढ़ाव से भरे सफर का नया अध्याय मानी जा रही है। पूजा पाल का जीवन निजी दुख, राजनीतिक संघर्ष और न्याय की लड़ाई से जुड़ा रहा है। शादी के महज नौ दिन बाद पति की हत्या हो जाने के बाद उन्होंने परिस्थितियों के चलते राजनीति में कदम रखा और धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश की चर्चित महिला नेताओं में अपनी पहचान बनाई।


शादी के नौ दिन बाद बदल गई जिंदगी

पूजा पाल का जन्म 25 जुलाई 1979 को प्रयागराज के कटघर इलाके में हुआ। उनके पिता अमृतलाल पाल साइकिल रिपेयरिंग की दुकान चलाते थे। वर्ष 2000 के आसपास उनकी मुलाकात बसपा नेता राजू पाल से हुई और दोनों ने 15 जनवरी 2005 को विवाह कर लिया। लेकिन शादी के केवल नौ दिन बाद, 24 जनवरी 2005 को राजू पाल की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस घटना ने पूरे प्रदेश की राजनीति को हिला दिया और पूजा पाल की जिंदगी पूरी तरह बदल गई।


राजनीति में मजबूरी में रखा कदम

राजू पाल की हत्या के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने पूजा पाल को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। उस समय उन्हें राजनीति का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन पति की राजनीतिक विरासत और न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला किया। साल 2005 के उपचुनाव में बसपा ने उन्हें इलाहाबाद पश्चिम सीट से उम्मीदवार बनाया। उनके सामने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अशरफ, जो अतीक अहमद के भाई थे, मैदान में थे। पूजा यह चुनाव हार गईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।


अतीक और अशरफ के खिलाफ चुनावी जीत

2007 के विधानसभा चुनाव में पूजा पाल ने दोबारा उसी सीट से चुनाव लड़ा और अशरफ को हराकर विधायक बनीं। इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सीधे अतीक अहमद को चुनाव में मात दी। यह जीत उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है।


बसपा से सपा तक का सफर

2017 के विधानसभा चुनाव में पूजा पाल को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 2018 में उन्हें बसपा से निष्कासित कर दिया गया। साल 2019 में उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। उनका कहना था कि अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी अपराधियों से दूरी बनाने की कोशिश कर रही है, इसलिए उन्होंने सपा में शामिल होने का फैसला किया। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने उन्हें कौशांबी की चायल सीट से टिकट दिया, जहां उन्होंने जीत दर्ज कर तीसरी बार विधायक बनने का गौरव हासिल किया।


अतीक अहमद की मौत के बाद बदला राजनीतिक रुख

2023 में अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की हत्या के बाद पूजा पाल का राजनीतिक रुख धीरे-धीरे बदलने लगा। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार की माफिया विरोधी कार्रवाई और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस नीति की सार्वजनिक रूप से सराहना की। बाद में राज्यसभा चुनाव में भी उन्होंने सपा के बजाय भाजपा समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया, जिससे उनके और समाजवादी पार्टी के बीच दूरी और बढ़ गई।


सपा से निष्कासन और भाजपा में नई जिम्मेदारी

14 अगस्त 2025 को समाजवादी पार्टी ने पूजा पाल को पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बाद वह लगातार भाजपा के कार्यक्रमों और मंचों पर नजर आने लगीं। अब भाजपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश संगठन में प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि पार्टी आगामी चुनावों में उनके राजनीतिक अनुभव और जनाधार का उपयोग करना चाहती है।


संघर्ष से नेतृत्व तक का सफर

पूजा पाल का राजनीतिक जीवन उत्तर प्रदेश की उन चुनिंदा कहानियों में शामिल है, जहां व्यक्तिगत त्रासदी ने उन्हें राजनीति में आने के लिए मजबूर किया। पति की हत्या के बाद इंसाफ की लड़ाई लड़ते हुए उन्होंने कई चुनाव लड़े, जीत दर्ज की और समय के साथ अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई। भाजपा में प्रदेश उपाध्यक्ष के रूप में नई जिम्मेदारी मिलने के बाद अब उनकी भूमिका उत्तर प्रदेश की राजनीति में और महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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