ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
कनाडा में कुछ खालिस्तानी चरमपंथी संगठनों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज है, क्योंकि सुरक्षा सहयोग और फंडिंग पर कार्रवाई के संकेत सामने आ रहे हैं।
हाल के महीनों में भारत-कनाडा रिश्तों में सुधार की बातें भी दिखीं,
और इसी के साथ यह सवाल उठ रहा है कि क्या अब कनाडा इन नेटवर्क्स पर
ज्यादा सख्ती दिखाएगा।
यह मुद्दा सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है—यह कानून-व्यवस्था,
फंडिंग, ऑनलाइन गतिविधियों और संगठित अपराध
जैसे पहलुओं से भी जुड़ता है।
आम भाषा में
समझें तो बात यह है कि जब दो देश सुरक्षा एजेंसियों के स्तर पर एक-दूसरे के करीब
आते हैं,
तो उन मामलों पर भी दबाव बढ़ता है जिन पर लंबे समय से मतभेद रहे
हैं।
इसी माहौल में “फंडिंग कहां से आती है”, “कौन
चलाता है”, “कौन सपोर्ट करता है” जैसे सवालों पर जांच तेज
होने की संभावना बढ़ जाती है।
1) सुरक्षा सहयोग बढ़ा: NSA अजीत डोभाल की कनाडा यात्रा
7 फरवरी
2026 को भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने कनाडा का दौरा किया और कनाडा की नेशनल सिक्योरिटी व
इंटेलिजेंस एडवाइजर नथाली ड्रोइन से मुलाकात की।
रिपोर्ट के मुताबिक यह बैठक भारत और कनाडा की नियमित द्विपक्षीय
सुरक्षा वार्ता का हिस्सा थी।
यह भी बताया गया कि जून 2023 में निज्जर हत्या
कांड के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ा था, लेकिन
कनाडा में नई सरकार आने के बाद हालात में सुधार देखा गया।
इस तरह की
बैठकों का असली मतलब “फोटो और बयान” नहीं होता, बल्कि
सिस्टम बनाना होता है ताकि दोनों तरफ की एजेंसियां सही समय पर सूचनाएं शेयर कर
सकें।
अगर सुरक्षा स्तर पर सीधा संवाद बढ़ता है, तो
संदिग्ध फंडिंग, संदिग्ध लोगों की आवाजाही और हिंसा वे
से जुड़े मामलों पर तेजी से कार्रवाई की संभावना भी बढ़ती है।
2) लायजन ऑफिसर: एजेंसियों का सीधा लिंक
रिपोर्ट के
अनुसार इस बैठक में तय हुआ कि दोनों देश अपने-अपने सिक्योरिटी और लॉ-एनफोर्समेंट
लायजन ऑफिसर नियुक्त करेंगे, ताकि एजेंसियों के
बीच सीधा संपर्क मजबूत हो।
खबर में यह भी कहा गया कि इस सहयोग का उद्देश्य ड्रग्स तस्करी
(खासकर फेंटानिल प्रीकर्सर) और अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध नेटवर्क पर समय रहते
जानकारी साझा करना है।
रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे सहयोग से खालिस्तानी नेटवर्क की गतिविधियों
पर नजर रखना और उनके खिलाफ कार्रवाई करना आसान हो सकता है।
यह बात ध्यान
रखने वाली है कि अक्सर “चरमपंथी नेटवर्क” अकेले नहीं चलते—उनके आसपास फंडिंग,
नकली दस्तावेज, संगठित अपराध, और ऑनलाइन प्रचार जैसी कई परतें होती हैं।
जब दो देशों की एजेंसियों के बीच “सीधा चैनल” बनता है, तो इन परतों की जांच में समय कम लगता है और सबूत जुटाने में मदद मिलती है।
3) बदलती वैश्विक राजनीति और रिश्ते सुधारने की जरूरत
रिपोर्ट में
कहा गया कि कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी बदलती वैश्विक राजनीति में अपनी
भूमिका देखते हैं और इसी सोच के तहत वे रिश्ते संभालने/बढ़ाने की कोशिश कर रहे
हैं।
खबर के मुताबिक उन्होंने हाल ही में चीन का दौरा किया और वे मार्च
में भारत भी आने वाले हैं।
रिपोर्ट में यह भी तर्क दिया गया कि भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने
के लिए कनाडा को उन मुद्दों पर कदम उठाने होंगे जो दोनों देशों में तनाव की वजह
रहे हैं—जिसमें खालिस्तानी संगठनों का मुद्दा प्रमुख है।
कूटनीति में कई
बार “इच्छा” से ज्यादा “मजबूरी” काम करती है।
अगर किसी देश को व्यापार, टेक्नोलॉजी, सुरक्षा या इंडो-पैसिफिक जैसे बड़े मामलों में साझेदारी चाहिए, तो उसे अपने यहां के विवादित मुद्दों पर भी ठोस नीति दिखानी पड़ती है।
4) फंडिंग पर बड़ा संकेत: सरकारी रिपोर्ट का दावा
रिपोर्ट के मुताबिक
सितंबर में कनाडा सरकार ने आधिकारिक तौर पर माना कि देश के भीतर से खालिस्तानी
चरमपंथी संगठनों को आर्थिक मदद मिल रही है।
खबर में कहा गया कि एक सरकारी रिपोर्ट में बब्बर खालसा और इंटरनेशनल
सिख यूथ फेडरेशन जैसे संगठनों को कनाडा से फंडिंग मिलने की बात लिखी गई।
रिपोर्ट के अनुसार यह पैसा क्रिप्टोकरेंसी, क्राउड-फंडिंग
और कुछ गैर-लाभकारी संगठनों के जरिए पहुंचाया जा रहा है।
यह हिस्सा सबसे
अहम है,
क्योंकि जब किसी सरकार की रिपोर्ट में फंडिंग के रास्ते और तरीके
लिखे जाते हैं, तो आगे जांच एजेंसियों के पास कार्रवाई का
आधार मजबूत हो जाता है।
फिर बात सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप की नहीं रहती; डिजिटल
ट्रेल, ट्रांजैक्शन, और संगठन से जुड़े
लोगों की भूमिका पर फोकस आ जाता है।
आगे क्या हो सकता है: “सख्ती” का मतलब क्या निकलेगा
इन संकेतों के
आधार पर आने वाले समय में कनाडा में कुछ कदम देखने को मिल सकते हैं—जैसे संदिग्ध
फंडिंग चैनलों की जांच, क्राउड-फंडिंग
प्लेटफॉर्म की स्क्रूटनी, और संदिग्ध संस्थाओं की
ऑडिटिंग।
सुरक्षा सहयोग बढ़ने पर दो देशों के बीच सूचना साझा करने की गति भी
बढ़ सकती है, जिससे केस बनाने और कानूनी प्रक्रिया आगे
बढ़ाने में मदद मिलती है।
रिपोर्ट की लाइन यही इशारा करती है कि “ठोस कदम” के लिए जमीन तैयार
हो रही है।
हालांकि यह भी
समझना जरूरी है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में कार्रवाई का रास्ता कानून और
सबूतों से होकर ही जाता है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी और उकसावे के बीच फर्क तय करना सरकारों
और अदालतों—दोनों के लिए चुनौती होता है।
इसी वजह से “नेटवर्क पर सख्ती” का असर धीरे-धीरे, केस-दर-केस और जांच-दर-जांच दिखाई देता है, न कि एक
दिन में सब बदल जाता है।
आम लोगों के लिए इसका मतलब
कनाडा में रहने
वाले भारतीय मूल के लोग, खासकर पंजाब/सिख समुदाय,
लंबे समय से यह चाहते हैं कि वहां माहौल सुरक्षित रहे और किसी भी
तरह की धमकी, डर या हिंसा को बढ़ावा न मिले।
दूसरी तरफ कई लोग यह भी चाहते हैं कि वैध राजनीतिक गतिविधि और
लोकतांत्रिक अधिकारों को गलत तरीके से निशाना न बनाया जाए।
इसी संतुलन को बनाते हुए अगर फंडिंग और अपराध से जुड़ी गतिविधियों
पर कार्रवाई बढ़ती है, तो इसका असर समुदाय के भीतर “भरोसा”
और “सुरक्षा”—दोनों पर पड़ सकता है।
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