ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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भारत और अमेरिका के बीच हुए नए ट्रेड समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। इस बीच व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट का बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई सीधी बातचीत के बाद भारत रूसी तेल की खरीद बंद करने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। इस बयान के बाद ऊर्जा बाजार और वैश्विक राजनीति में हलचल बढ़ गई है।
व्हाइट हाउस ने क्या कहा
मंगलवार को मीडिया से बातचीत करते हुए कैरोलिन लीविट ने कहा कि भारत ने रूस से तेल आयात कम करने और अमेरिका से तेल खरीद बढ़ाने का वादा किया है। उन्होंने बताया कि यह फैसला दोनों देशों के नेताओं के बीच हुई सीधी फोन कॉल के बाद सामने आया।
लीविट ने यह भी कहा कि भारत वेनेजुएला से तेल खरीदने पर भी विचार कर सकता है। उनके मुताबिक यह कदम अमेरिकी श्रमिकों और उद्योगों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। उन्होंने बताया कि फिलहाल वेनेजुएला के तेल व्यापार को अमेरिका ही संभाल रहा है, इसलिए इससे अमेरिकी आर्थिक हितों को मजबूती मिलेगी।
ऊर्जा समझौते को बताया बड़ी रणनीति
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव ने इस समझौते को सिर्फ ऊर्जा व्यापार तक सीमित नहीं बताया, बल्कि इसे एक बड़ी रणनीतिक योजना का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका लंबे समय से चाहता था कि भारत रूसी ऊर्जा आपूर्ति पर अपनी निर्भरता कम करे।
लीविट के अनुसार, इस समझौते से दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत होंगे और अमेरिका की अर्थव्यवस्था को भी फायदा मिलेगा। उन्होंने कहा कि यह समझौता ऊर्जा आयात, निवेश और व्यापार के नए अवसर खोल सकता है।
अमेरिका में बड़े निवेश की संभावना
लीविट ने यह भी दावा किया कि भारत अमेरिका में बड़े स्तर पर निवेश करने की योजना बना रहा है। उनके अनुसार, भारत परिवहन, ऊर्जा और कृषि जैसे क्षेत्रों में लगभग 500 अरब डॉलर तक निवेश कर सकता है।
उन्होंने कहा कि अगर यह निवेश योजना सफल होती है तो इससे अमेरिका के बुनियादी ढांचे और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बड़ा फायदा मिल सकता है। साथ ही इससे दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते और मजबूत होने की उम्मीद है।
ट्रंप की भूमिका पर दिया जोर
एक इंटरव्यू के दौरान लीविट ने कहा कि इस समझौते को संभव बनाने में राष्ट्रपति ट्रंप की व्यक्तिगत भूमिका अहम रही है। उन्होंने बताया कि ट्रंप ने इस समझौते को लेकर सीधे बातचीत की और भारत के साथ कई अहम मुद्दों पर सहमति बनाई। उनके मुताबिक यह समझौता अमेरिका के लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों तरह से फायदेमंद साबित हो सकता है।
भारत का फोकस घरेलू हितों पर
जहां अमेरिका इस समझौते को बड़ी आर्थिक सफलता बता रहा है, वहीं भारत ने अपने घरेलू हितों को सुरक्षित रखने पर जोर दिया है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इस मुद्दे पर बयान देते हुए कहा कि समझौते के दौरान कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों का खास ध्यान रखा गया है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा किसानों और ग्रामीण मजदूरों के हितों की रक्षा को प्राथमिकता देते रहे हैं। सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि अंतरराष्ट्रीय समझौते का असर इन क्षेत्रों पर न पड़े।
आगे क्या हो सकता है असर
इस समझौते के बाद भारत की ऊर्जा नीति में बदलाव देखने को मिल सकता है। अगर भारत रूस से तेल खरीद कम करता है तो वैश्विक तेल बाजार पर भी इसका असर पड़ सकता है। साथ ही अमेरिका और भारत के बीच व्यापार और निवेश के नए रास्ते खुल सकते हैं।
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा। आने वाले समय में यह साफ होगा कि यह समझौता दोनों देशों के लिए कितना फायदेमंद साबित होता है।
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