ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
ईरान की सड़कों पर इन दिनों आग नजर आ रही है। महंगाई और करेंसी की कीमत गिरने से परेशान लोग दो हफ्ते से सड़कों पर उतर आए हैं। अब मामला और गंभीर हो गया है क्योंकि निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी ने लोगों से इस्लामिक शासन के खिलाफ आवाज उठाने की अपील की। इसके बाद दर्जनों शहरों में प्रदर्शनकारियों की तादाद बढ़ गई। सरकार ने घबराहट में इंटरनेट और फोन सर्विस बंद कर दी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरानी लोगों का साथ देते हुए चेतावनी दी है। ये सब कुछ देखकर लगता है जैसे पुरानी क्रांति की यादें ताजा हो रही हों।
प्रदर्शन कैसे शुरू हुए?
सब कुछ महंगाई से शुरू हुआ। ईरान की
अर्थव्यवस्था पहले से ही मुश्किल में थी। दवाओं से लेकर रोटी तक सब महंगा हो गया।
करेंसी की वैल्यू इतनी गिर गई कि आम आदमी का गुजारा मुश्किल हो गया। पहले
छोटे-छोटे बाजार बंद हुए, फिर लोग सड़कों पर
नारे लगाने लगे। दो हफ्ते बीतते-बीतते कम से कम 50 शहरों में
हंगामा फैल गया। तेहरान जैसे बड़े शहरों में तो रातें ही जंग का मैदान बन गईं। लोग
गाड़ियां जला रहे हैं, सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंक रहे हैं।
रिपोर्ट्स कहती हैं कि अब तक 39 लोग मारे जा चुके हैं और 2000
से ज्यादा गिरफ्तार हो चुके हैं।
ये आंकड़े डराने वाले हैं लेकिन ये बताते हैं कि लोग कितने गुस्से में हैं। घर में खाने को कुछ न मिले तो इंसान क्या करेगा? बस वही कर रहा है—आवाज उठा रहा है।
रेजा पहलवी की अपील ने बदला खेल
रेजा पहलवी कौन हैं?
ये वो शख्स हैं जिनके पिता 1979 की इस्लामिक
क्रांति से ठीक पहले ईरान छोड़कर अमेरिका भाग गए थे। आज रेजा भी अमेरिका में ही
निर्वासित जिंदगी जी रहे हैं। गुरुवार रात 8 बजे उन्होंने
वीडियो मैसेज जारी किया। कहा—घरों से निकलो, सड़कों पर आओ,
इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ एकजुट हो जाओ। दुनिया तुम पर नजर रखे
हुए है, ट्रंप भी देख रहे हैं। जुल्म का जवाब मिलेगा।
इस अपील का असर तुरंत दिखा। रात ठीक 8
बजे तेहरान की गलियों में नारे गूंजने लगे। "इस्लामिक रिपब्लिक
मुर्दाबाद", "डिक्टेटर मुर्दाबाद"। कुछ लोग
तो "पहलवी वापस आएंगे, ये आखिरी जंग है" चिल्ला
रहे थे। पहले शाह के समर्थन में नारा लगाना मौत का कारण बन जाता था, लेकिन अब लोग बेझिझक लगा रहे हैं। ये बदलाव बड़ा है। लगता है लोग पुराने
जमाने को याद कर रहे हैं जब शाह का राज था।
रेजा ने कहा था कि लोगों की प्रतिक्रिया देखकर अगला ऐलान करेंगे। कल शुक्रवार को भी वैसा ही कुछ होने वाला है। कुर्द पार्टियां भी हड़ताल की अपील कर रही हैं।
सरकार का जवाब: इंटरनेट-पफोन बंद
जब हालात बेकाबू होते दिखे तो सरकार
ने पुराना हथियार आजमाया—संचार सेवा बंद। इंटरनेट मॉनिटरिंग ग्रुप्स ने बताया कि
कई इलाके पूरी तरह ऑफलाइन हो गए। फोन लाइनें कट गईं। सुरक्षाबल सड़कों पर उतर आए।
एक पुलिस स्टेशन पर हमला हुआ जिसमें 5 जवान
मारे गए। लेकिन अभी तक फुल इंटरनेट ब्लैकआउट या भारी गोलीबारी नहीं हुई। शायद
सरकार सोच रही है कि मामला ज्यादा न फैले।
पिछले साल महसा अमिनी केस में ऐसा ही हुआ था। लेकिन वो आंदोलन दब गया। इस बार रेजा पहलवी का लीडरशिप रोल नया है। लोग उन पर भरोसा कर रहे हैं।
ट्रंप का बयान: हम नहीं छोड़ेंगे
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने
ट्वीट किया कि ईरानी लोगों की आवाज दबाने की कोशिश की गई तो हम चुप नहीं बैठेंगे।
ये बयान इसलिए अहम है क्योंकि ट्रंप ईरान के पुराने आलोचक रहे हैं। रेजा पहलवी ने
भी ट्रंप का नाम लिया। कहा—दुनिया और ट्रंप नजर रखे हुए हैं। ये अंतरराष्ट्रीय
दबाव बना रहा है। ईरान की सरकार को सोचना पड़ेगा।
ट्रंप का ये स्टैंड ईरानी लोगों को हौसला दे रहा है। बाहर से समर्थन मिले तो साहस बढ़ता है।
प्रदर्शनकारियों के नारे क्या कहते
हैं?
सड़कों पर जो नारे लग रहे हैं, वो शासन के खिलाफ गुस्से को बयां करते हैं। "शाह जिंदाबाद", "पहलवी लौट आओ"। कुछ जगह कुर्द लोग हड़ताल कर रहे हैं। बाजार बंद हैं। तेहरान के बाजारों में तो लोग जुलूस निकाल रहे हैं। हिंसा हो रही है—गाड़ियां जल रही हैं, सुरक्षाबल भाग रहे हैं। लेकिन सवाल ये है कि ये सब कब तक चलेगा? सरकार दबाएगी या लोग जीत जाएंगे?
ईरान की अर्थव्यवस्था क्यों टूट रही?
मुख्य वजह महंगाई है। प्रतिबंधों से व्यापार ठप। तेल बिक नहीं रहा। करेंसी डॉलर के मुकाबले गिर गई। दवा, अनाज सब महंगा। लोग भूखे हैं। ऐसे में शासन पर गुस्सा फूटना लाजमी है। 1979 की क्रांति भी इसी गुस्से से हुई थी। इतिहास खुद को दोहरा रहा है।
आगे क्या होगा?
आज शुक्रवार है। जुमे की नमाज के बाद
प्रदर्शन और तेज हो सकते हैं। रेजा पहलवी अगला ऐलान करेंगे। अगर हिंसा बढ़ी तो
ट्रंप जैसी ताकतें दखल देंगी। लेकिन ईरान की सरकार भी कमजोर नहीं। रिवॉल्यूशनरी
गार्ड तैयार हैं। कुर्द इलाकों में भी हलचल है। ये आंदोलन या तो दब जाएगा या बड़ा
बदलाव लाएगा। दुनिया की नजरें ईरान पर टिकी हैं
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