ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच लंबे समय से चली आ रही मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement – FTA) अब गंभीरता से अंतिम चरण में पहुंच चुका है। इस समझौते को कई विशेषज्ञ और नीति‑निर्माता “मदर ऑफ ऑल डील्स” यानी “सभी समझौतों की जननी” के रूप में बोल रहे हैं, क्योंकि इससे न सिर्फ भारत और यूरोपीय बाजार के बीच व्यापार बढ़ेगा, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के मानचित्र को भी बदल सकता है।
दुनिया के बड़े बाजार का निर्माण
दावोस (World Economic Forum) के मंच पर यूरोपीय आयोग की अध्यक्षा उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने स्पष्ट संकेत दिए कि भारत‑EU FTA पर दोनों पक्ष लगभग सहमत हैं और इससे एक बड़ा संयुक्त बाजार बन सकता है। वे कहती हैं कि यह समझौता 2 अरब लोगों का बाजार तैयार करेगा और वैश्विक GDP के लगभग एक‑चौथाई हिस्से को कवर करेगा।
यह सिर्फ बड़े आंकड़े नहीं हैं। दो महाद्वीपों के व्यापारिक नेटवर्क का जुड़ना दुनिया भर के निर्यात‑आयात मॉडल को फिर से परिभाषित कर सकता है। यूरोप और भारत दोनों ही तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएँ हैं, और इस समझौते से दोनों को रणनीतिक लाभ मिलेगा, खासकर जब वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव हो रहा है।
बातचीत की लंबी यात्रा: 2007 से आज तक
भारत‑EU FTA की बातचीत 2007 में शुरू हुई थी, लेकिन विभिन्न कारणों से यह लगभग 18 साल तक लंबित रही। सालों तक तनाव और बातचीत के बार‑बार रुकने के बावजूद, 2022 से नए सिरे से बातचीत को गति मिली। दोनों पक्षों ने tariff दरों, बाजार पहुंच, टेक्नोलॉजी साझेदारी और सेवा‑क्षेत्र सहयोग जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत की।
अब जब सम्भावित समझौता लगभग तय की ओर है, तो यह दिखाता है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो और दोनों पक्षों में भरोसा हो, तो लंबी बातचीत भी सकारात्मक परिणाम में बदल सकती है।
भारत के लिए क्या है बड़ा फायदा?
इस व्यापार समझौते से भारत को कई मोर्चों पर लाभ मिलने की उम्मीद है। सबसे बड़ा फायदा है 27 EU देशों के बाजार तक आसान पहुंच। इससे भारतीय निर्यातकों को यूरोप के वरिष्ठ बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा और बड़ी कंपनियों के साथ साथ छोटे और मध्यम उद्योगों को भी नई अवसर मिलेंगे।
विशेषकर टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग गुड्स, दवाइयां और सेवाओं जैसे क्षेत्र मजबूत हो सकते हैं। इससे न सिर्फ रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, बल्कि विनिर्माण क्षमता भी बढ़ेगी। प्रतिनिधियों का मानना है कि यह समझौता भारत के लिए वैश्विक सप्लाई‑चेन में ऊपर उठने का एक बड़ा मौका है।
EU के लिए भारत क्यों महत्वपूर्ण?
यूरोपीय यूनियन के लिए भारत एक रणनीतिक साझेदार बन चुका है। दुनिया भर में सप्लाई‑चेन में विविधता लाने की कोशिशों में, EU चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। इसी रणनीति के तहत भारत एक महत्वपूर्ण साथी बनकर सामने आया है।
इसके अलावा, भारत की युवा आबादी, तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और तकनीकी‑सेवा‑क्षेत्र की ताकत EU के लिए आकर्षण का बड़ा कारण है। यह समझौता केवल व्यापार का नहीं, बल्कि तकनीकी सहयोग और निवेश को भी आगे बढ़ाने का एक मंच बनेगा।
क्या इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ क्यों कहा जा रहा है?
इस समझौते को “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है क्योंकि यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा और व्यापक FTA हो सकता है। भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने खुद इस समझौते का उल्लेख करते हुए कहा है कि भारत ने अब तक सात विकसित देशों के साथ FTAs किए हैं, लेकिन यह सौदा उन सब से बड़ा होगा क्योंकि यह दो सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक ब्लॉकों को जोड़ता है।
यह नाम सिर्फ भव्यता के लिए नहीं है, बल्कि वास्तविक आर्थिक महत्व और संभावित प्रभाव के कारण है। यह सिर्फ व्यापार मात्र नहीं बढ़ाएगा, बल्कि निवेश, कौशल तथा बाजार पहुंच की नई परतें भी खोलेगा।
ट्राम्प के टैरिफ गेम के बीच एक अलग राह
जब दुनिया के दूसरे हिस्सों में व्यापार को लेकर अनिश्चितता और टैरिफ बढ़ने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं, भारत‑EU का यह समझौता एक सकारात्मक उदाहरण बन रहा है। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से टैरिफ‑संबंधी कड़े कदमों और धमकियों के बीच, भारत ने अपने व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए हैं और यह दूसरा मामला दिखाता है कि भारत वैश्विक व्यावसायिक चुनौतियों को अवसर में बदलने की कोशिश कर रहा है।
यूरोप और अन्य देशों के बीच व्यापार और Tariff रणनीतियों के बीच, भारत की यह अहम बातचीत एक सकारात्मक संदेश देती है कि वैश्विक आर्थिक प्रतियोगिता में सहयोग का रास्ता भी खुला है।
ये समझौता कब तक फाइनल हो सकता है?
समझौते के बारे में उम्मीद है कि इसे 27 जनवरी 2026 के आसपास औपचारिक रूप से अंतिम रूप दिया जायेगा। दरअसल, भारत में 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस के अवसर पर EU के शीर्ष नेताओं का दौरा होने वाला है, और इसी बीच इस FTA पर अंतिम हस्ताक्षर की उम्मीद जताई जा रही है।
यद्यपि अभी कुछ तकनीकी बिंदु और शेष हैं, दोनों पक्षों के नेताओं का निर्णय प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए सकारात्मक है। इस बात का असर यह भी है कि भारत और EU के बीच राजनीतिक तथा आर्थिक संबंध और मजबूत होंगे।
आगे की चुनौतियाँ
हालांकि यह समझौता दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ भी हैं। प्रमुख मुद्दों में कृषि‑उत्पादों के लिए टैरिफ दरों और बाजार पहुंच पर बातचीत शामिल है, जिसे संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। ऐसे मुद्दों को संतुलित करना दोनों पक्षों के लिए आवश्यक होगा ताकि घरेलू उत्पादन और निर्यात दोनों को नुकसान न पहुंचे।
दूसरी चुनौती यह है कि बाजार खुलने से स्थानीय उद्योगों को प्रतिस्पर्धात्मक दबाव का सामना करना पड़ सकता है। इसके लिए भारत को अपनी विनिर्माण क्षमताओं को और मज़बूत करना होगा और वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पादन प्रणाली तैयार करनी होगी।
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