ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने के मामले में भारत ने अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। सरकार के अंदर इस पहल के राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक पहलुओं पर गंभीर विचार-विमर्श चल रहा है। सूत्रों के अनुसार, यह प्रस्ताव कई संवेदनशील मुद्दों से जुड़ा है, इसलिए किसी भी तरह का जल्दबाजी में निर्णय नहीं लिया जा रहा है।
औपचारिक निमंत्रण और भारत का रुख
भारतीय अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि भारत को इस वैश्विक पहल में औपचारिक निमंत्रण मिला है, लेकिन निमंत्रण मिलने का मतलब यह नहीं है कि भारत तुरंत इसमें शामिल होगा। भारत की विदेश नीति हमेशा संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। इस पहल की समीक्षा इसी दृष्टिकोण से की जा रही है।
भारत का पारंपरिक रुख यह है कि इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष का स्थायी समाधान केवल दो-राष्ट्र सिद्धांत के जरिए ही संभव है। भारत ऐसे हर प्रयास का समर्थन करता है जो क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता की दिशा में ईमानदारी से काम करे।
भारतीय पक्ष की प्रमुख चिंताएँ
भारत की मुख्य चिंता यह है कि प्रस्तावित बोर्ड का दायरा केवल गाजा तक सीमित न रहकर भविष्य में संवेदनशील मुद्दों जैसे कश्मीर तक बढ़ सकता है। ऐसा होने पर भारत इसे स्वीकार्य नहीं मानता। यह पहल कई देशों को जोड़ती है, लेकिन भारत के लिए उसके दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन करना जरूरी है।
इस संदर्भ में ट्रंप के पुराने दावों को भी याद किया जा रहा है, जब उन्होंने मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए सीमित सैन्य संघर्ष को खत्म करने का श्रेय लिया था। भारत ने स्पष्ट किया था कि संघर्ष विराम केवल दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच बातचीत का नतीजा था, न कि किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का।
फ्रांस का सतर्क रुख
भारत की तरह फ्रांस भी इस बोर्ड को लेकर सतर्क है। पेरिस ने संकेत दिया है कि फिलहाल यह बोर्ड उनके पक्ष में नहीं है। फ्रांसीसी पक्ष कानूनी ढांचे और संयुक्त राष्ट्र प्रणाली पर इस पहल के संभावित असर का मूल्यांकन कर रहा है। उनका मानना है कि बोर्ड केवल गाजा तक सीमित नहीं है और यह संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा सिद्धांतों और बहुपक्षीय व्यवस्था से टकराव कर सकता है।
अन्य देशों की प्रतिक्रिया
यूरोपीय संघ, रूस, बेलारूस और थाईलैंड जैसे देशों ने इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण मिलने की पुष्टि की है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने इसे सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किया है, हालांकि अंतिम शर्तें अभी तय होना बाकी हैं। यह बोर्ड गाजा में इजरायल और हमास के बीच युद्धविराम समझौते के दूसरे चरण से जुड़ा हुआ है।
कार्यकारी समिति का गठन
व्हाइट हाउस ने इस पहल को लागू करने के लिए एक कार्यकारी समिति के गठन की घोषणा की है। इस समिति में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, मध्य पूर्व के लिए अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, जेरेड कुश्नर और विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा जैसे नाम शामिल हैं। यह समिति बोर्ड की दिशा और संचालन की जिम्मेदारी संभालेगी।
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