ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
दिल्ली में 2020 के दंगों को 6 साल हो गए हैं, लेकिन उस दौर की राजनीति, दर्द और केस आज भी खत्म नहीं हुए। इसी बरसी पर प्रेस क्लब में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, जहां उमर खालिद की दोस्त बानो ज्योत्सना लाहिरी ने खुलकर अपनी बात रखी। उनकी बातों का सार यह था कि कुछ लोगों को चुन-चुनकर जेल में रखा गया, और जिन पर हिंसा भड़काने का आरोप होना चाहिए था, उन पर वैसी कार्रवाई नहीं हुई जैसी होनी चाहिए थी।
“धर्म की वजह से जेल में हैं” – सीधा आरोप
बानो ज्योत्सना का आरोप है कि उमर खालिद और शरजील इमाम को मुसलमान होने की वजह से जेल में रखा गया। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों “बेखौफ” हैं, इसलिए भी उन्हें निशाना बनाया गया। यह एक बहुत बड़ा और संवेदनशील आरोप है, क्योंकि इसमें न्याय व्यवस्था, जांच की दिशा और समानता के सवाल सीधे उठते हैं। उनकी बातों ने फिर से वही बहस जगा दी—क्या जांच सच में बराबरी से हुई या नहीं?
कानून पर भरोसा, लेकिन निराशा भी
उन्होंने एक तरफ कानून-व्यवस्था पर भरोसा जताया और कहा कि इंसाफ आज नहीं तो कल इसी सिस्टम से निकलेगा। लेकिन साथ ही उन्होंने हताशा और निराशा की बात भी की। यह वही भावना है जो लंबे समय से जेल में बंद आरोपियों के परिवारों और दोस्तों में दिखाई देती है—केस चलता रहता है, समय बीतता जाता है, और जिंदगी रुक-सी जाती है।
“लाइव स्ट्रीम दंगा” और कॉल का मुद्दा
उनका कहना था कि दिल्ली दंगे “लाइव स्ट्रीम” हुए, यानी सबने देखा कि क्या हो रहा है। उन्होंने यह दावा भी किया कि किसने कॉल दिया, यह सबको पता है, लेकिन उसके बाद भी कार्रवाई की दिशा अलग रही। उनकी बात का संकेत यह था कि जिन लोगों के बयानों/भाषणों को जिम्मेदार मानकर देखा जाता है, उन पर वैसी सख्ती नहीं दिखी।
UAPA की वजह से जमानत क्यों मुश्किल
इस केस का एक बड़ा पहलू UAPA है। इस कानून के तहत जमानत मिलना बहुत कठिन माना जाता है। अक्सर ट्रायल शुरू होने से पहले राहत मिलना आसान नहीं होता। यही वजह है कि सालों तक लोग जेल में रहते हैं और केस कानूनी प्रक्रिया में आगे बढ़ता रहता है। इस व्यवस्था को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं—क्या लंबे समय तक बिना ट्रायल के जेल में रहना न्याय के दायरे में आता है?
बरसी पर सवाल वही, जवाब अभी बाकी
दिल्ली दंगों की बरसी हर साल एक बात याद दिलाती है—हिंसा से नुकसान आम लोगों का होता है, और राजनीति अपने-अपने हिसाब से कहानी बनाती है। इस बार भी बहस वहीं लौट आई है: जांच निष्पक्ष थी या नहीं, किन पर कार्रवाई हुई और किन पर नहीं, और ट्रायल कब शुरू होगा। अब सबसे जरूरी यह है कि प्रक्रिया तेज हो, सच सामने आए और इंसाफ की दिशा साफ दिखे—ताकि यह मामला सिर्फ बयानबाजी बनकर न रह जाए।
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