ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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पश्चिम एशिया की राजनीति में इन दिनों एक नया और अहम बदलाव देखने को मिल रहा है। ईरान ने साफ संकेत दिया है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर अमेरिका से सीधे बातचीत करना चाहता है। इस फैसले ने न सिर्फ क्षेत्रीय कूटनीति में हलचल पैदा कर दी है बल्कि तुर्की जैसे देशों की भूमिका को भी पीछे धकेल दिया है।
काफी समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बना हुआ है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का आरोप रहा है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में काम कर रहा है, जबकि ईरान लगातार इन आरोपों से इनकार करता आया है और कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ ऊर्जा और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए है।
अब जब ईरान ने अमेरिका से सीधे बातचीत की इच्छा जताई है, तो इसे क्षेत्रीय राजनीति में बड़ा संकेत माना जा रहा है। इससे पहले कई देशों के जरिए बातचीत की कोशिश होती रही है, लेकिन इस बार ईरान का सीधा संवाद का प्रस्ताव एक नई रणनीति की तरफ इशारा करता है।
तुर्की की भूमिका क्यों हुई कमजोर
पिछले कुछ वर्षों में तुर्की ने खुद को मध्यस्थ देश के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की थी। तुर्की पश्चिम और मुस्लिम देशों के बीच संतुलन बनाने की नीति अपनाता रहा है। ऐसे में ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु मुद्दे पर बातचीत कराने में भी तुर्की की भूमिका अहम मानी जा रही थी।
लेकिन हालिया घटनाओं से संकेत मिल रहे हैं कि ईरान अब किसी तीसरे देश की जरूरत नहीं समझ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का यह कदम यह दिखाता है कि वह अमेरिका के साथ सीधे संबंधों में स्पष्टता चाहता है। इससे तुर्की की कूटनीतिक स्थिति थोड़ी कमजोर होती नजर आ रही है।
तुर्की लंबे समय से खुद को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है और कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर मध्यस्थ बनने की कोशिश करता रहा है। लेकिन ईरान के इस फैसले से यह साफ हो गया है कि हर देश अपने हितों के हिसाब से कूटनीतिक रणनीति तय करता है।
अमेरिका और ईरान के रिश्तों का इतिहास
ईरान और अमेरिका के संबंध कई दशकों से उतार-चढ़ाव से भरे रहे हैं। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद दोनों देशों के रिश्तों में भारी तनाव आ गया था। इसके बाद से कई बार बातचीत और समझौते की कोशिशें हुईं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल पाया।
2015 में ईरान और कई विश्व शक्तियों के बीच परमाणु समझौता हुआ था। इस समझौते का उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण रखना और बदले में उस पर लगे प्रतिबंधों में राहत देना था। हालांकि बाद में अमेरिका ने इस समझौते से खुद को अलग कर लिया, जिससे फिर से तनाव बढ़ गया।
इसके बाद से दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी बनी हुई है। कई बार अप्रत्यक्ष बातचीत की कोशिशें हुईं, लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। अब ईरान का सीधे बातचीत की इच्छा जताना इस दिशा में नया प्रयास माना जा रहा है।
पश्चिम एशिया में बदलते समीकरण
ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत का असर पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति पर पड़ सकता है। यह क्षेत्र पहले से ही कई संघर्षों और राजनीतिक तनाव से गुजर रहा है। ऐसे में अगर दोनों देशों के बीच बातचीत सफल होती है तो क्षेत्र में स्थिरता आने की उम्मीद बढ़ सकती है। दूसरी तरफ, कुछ देशों को इस बातचीत से चिंता भी हो सकती है। खास तौर पर वे देश जो ईरान को क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी मानते हैं, वे इस बदलाव को ध्यान से देख रहे हैं।
ईरान लंबे समय से यह कहता आया है कि वह किसी दबाव में आकर बातचीत नहीं करेगा। उसका मानना है कि बातचीत बराबरी और सम्मान के आधार पर होनी चाहिए। यही वजह है कि ईरान ने कई बार अंतरराष्ट्रीय दबाव को नजरअंदाज करते हुए अपनी स्वतंत्र नीति अपनाई है।
बातचीत के पीछे ईरान की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की यह नई रणनीति कई कारणों से जुड़ी हो सकती है। एक तरफ वह अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से राहत चाहता है, वहीं दूसरी तरफ वह वैश्विक स्तर पर अपनी छवि को मजबूत करना चाहता है। ईरान यह भी दिखाना चाहता है कि वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन अपनी शर्तों पर। इससे उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर राजनीतिक और कूटनीतिक फायदा मिल सकता है।
इसके अलावा, सीधे बातचीत से ईरान यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसकी बात बिना किसी मध्यस्थ के सीधे अमेरिका तक पहुंचे। इससे गलतफहमी कम होने और समाधान निकलने की संभावना बढ़ सकती है।
अमेरिका के लिए क्यों अहम है यह बातचीत
अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित रहा है। अमेरिका का मानना है कि अगर इस मुद्दे का समाधान नहीं निकला तो क्षेत्र में हथियारों की होड़ बढ़ सकती है। अगर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत सफल होती है तो यह वैश्विक राजनीति में भी बड़ा बदलाव ला सकती है। इससे ऊर्जा बाजार, सुरक्षा नीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी असर पड़ सकता है।
अमेरिका के लिए यह बातचीत इसलिए भी अहम है क्योंकि वह पश्चिम एशिया में स्थिरता चाहता है। क्षेत्र में तनाव कम होने से अमेरिका को अपने रणनीतिक हितों को मजबूत करने का मौका मिल सकता है।
आगे क्या हो सकता है
ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत अभी शुरुआती चरण में मानी जा रही है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि दोनों देश किन शर्तों पर बातचीत करते हैं और क्या कोई समझौता हो पाता है या नहीं। अगर बातचीत सफल होती है तो यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकती है। वहीं अगर बातचीत विफल होती है तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है। इस पूरे घटनाक्रम पर दुनिया की नजर बनी हुई है। पश्चिम एशिया के साथ-साथ यूरोप और एशिया के कई देश भी इस मुद्दे को गंभीरता से देख रहे हैं।
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