ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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जापान और अमेरिका के बीच 550 अरब डॉलर की ऐतिहासिक निवेश डील हो चुकी है, जिसमें जापान को अपने उत्पादों पर 15% टैरिफ देना होगा।
इस समझौते की घोषणा खुद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर की है।
अब भारत के सामने भी यही चुनौती खड़ी हो गई है, 1 अगस्त से पहले अमेरिका के साथ कोई ठोस व्यापार समझौता करना, वरना स्टील, एल्युमिनियम और ऑटो पार्ट्स जैसे सेक्टरों पर भारी टैरिफ का खतरा मंडरा रहा है।
खास बात ये है कि, जापान वही देश है जिसने शुरू में अमेरिकी टैरिफ नीति का विरोध किया था, लेकिन ट्रंप की ओर से तय डेडलाइन के दबाव में उसे समझौता करना पड़ा। इसके बाद भारत पर भी इसी तरह का दबाव बढ़ गया है।
550 अरब डॉलर की डील, लेकिन फायदा किसका?
अमेरिका और जापान के बीच हुई इस डील के तहत जापान अमेरिका में 550 अरब डॉलर का निवेश करेगा।
ट्रंप ने कहा है कि इस डील से 90% फायदा अमेरिका को होगा। लाखों नौकरियों के साथ अमेरिका को टैरिफ के रूप में बड़ा राजस्व भी मिलेगा।
जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा ने कहा है कि उन्हें डील की पूरी शर्तों को समझना बाकी है, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इसे अंतिम रूप दे दिया है। साफ है कि अमेरिका ने इस डील में दबाव की रणनीति का इस्तेमाल किया।
इंडोनेशिया और फिलिपींस भी झुके, अब भारत की बारी?
ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति सिर्फ जापान तक सीमित नहीं रही। इससे पहले अमेरिका ने फिलिपींस और इंडोनेशिया के साथ भी समझौते किए, जिनमें अमेरिकी उत्पादों को टैक्स छूट मिली और उनके उत्पादों पर 19% टैरिफ लगाया गया।
यानी ट्रंप की रणनीति एकतरफा फायदे के मॉडल पर काम कर रही है, दूसरे देश झुकें और अमेरिका को रियायत दें। अब भारत पर भी अमेरिका ने 1 अगस्त की डेडलाइन तय कर दी है।
भारत की रणनीति क्या है?
भारत सरकार फिलहाल अमेरिका के साथ एक ‘Mini Trade Deal’ को अंतिम रूप देने की तैयारी में है।
बातचीत निर्णायक दौर में है, लेकिन भारत ने अपना रुख कड़ा रखा है। भारत ने साफ कर दिया है कि WTO के नियमों के तहत उसे जवाबी टैरिफ लगाने का अधिकार है।
इसके अलावा, भारत ने स्टील और एल्युमिनियम पर लगे अतिरिक्त शुल्क को हटाने की मांग की है।
साथ ही, डेयरी, ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, पेट्रोकेमिकल्स और कृषि उत्पादों पर रियायतों की बात भी रखी गई है।
ट्रंप की डील से क्या संदेश मिला?
गौर करने वाली बात ये है कि ट्रंप किसी भी देश को टैरिफ से छूट तभी दे रहे हैं जब उन्हें निवेश, रोजगार या मार्केट एक्सेस में बड़ा लाभ मिले।
जापान की डील ने साफ कर दिया है कि अब हर देश को ट्रंप के टैरिफ दबाव के आगे या तो झुकना होगा या फिर कड़े निर्णय लेने होंगे।
भारत के पास अब बहुत वक्त नहीं बचा है। अगर 1 अगस्त से पहले डील नहीं होती, तो भारत को भारी टैक्स का सामना करना पड़ सकता है, जिससे निर्यात और रोजगार दोनों पर असर पड़ेगा।
क्या भारत अमेरिका से सख्ती से निपटेगा?
कहना गलत नहीं होगा कि भारत को इस टैरिफ चुनौती से निपटने के लिए एक संतुलित रणनीति बनानी होगी, जहां वह अमेरिका को जरूरी रियायतें दे, लेकिन अपनी घरेलू इंडस्ट्री के हितों से समझौता न करे।
ट्रंप की टैरिफ डिप्लोमेसी अब भारत के लिए भी टेस्ट बन गई है, क्या भारत इसमें पास हो पाएगा?
आप क्या सोचते हैं इस खबर को लेकर, अपनी राय हमें नीचे कमेंट्स में जरूर बताएँ।
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