धीरे-धीरे लंबा हो रहा है दिन, 60 करोड़ साल पहले था सिर्फ 21 घंटे का!
धीरे-धीरे लंबा हो रहा है दिन, 60 करोड़ साल पहले था सिर्फ 21 घंटे का!
  • Category: सामान्य ज्ञान

पृथ्वी पर एक दिन की लंबाई हमेशा 24 घंटे नहीं रही है, यह जानकर शायद आप चौंक जाएं। विज्ञान की एक स्टडी में यह दावा किया गया है कि लगभग 60 करोड़ साल पहले पृथ्वी पर एक दिन केवल 21 घंटे का हुआ करता था।


इसका मुख्य कारण पृथ्वी के घूमने की रफ्तार है, जो समय के साथ धीमी होती जा रही है। यह बदलाव लाखों-करोड़ों वर्षों में हुआ है, और यह अभी भी जारी है।


समय की इस यात्रा में ग्रह के भीतर और बाहर घट रही घटनाओं ने पृथ्वी की रोटेशन स्पीड को प्रभावित किया है, जिसका सीधा असर दिनों की लंबाई पर पड़ा है।


समय और रोटेशन का गहरा संबंध


पृथ्वी की घूर्णन गति यानी रोटेशन ही तय करती है कि एक दिन में कितने घंटे होंगे। आज के समय में हम एक दिन को 24 घंटे या 86,400 सेकंड के रूप में जानते हैं।  लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी की गति हमेशा इतनी नहीं रही।


अरबों साल पहले जब चंद्रमा धरती के अधिक करीब था और पृथ्वी के महासागर और वातावरण वैसा नहीं था जैसा आज है, तब ग्रह की स्पिनिंग स्पीड कहीं तेज हुआ करती थी। यही कारण है कि तब एक दिन में केवल 21 घंटे हुआ करते थे।


इसका मतलब है कि उस समय सूर्योदय और सूर्यास्त का चक्र आज के मुकाबले कहीं छोटा हुआ करता था। इस बदलाव का संबंध पृथ्वी और चंद्रमा के बीच के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से है, जिसे टाइडल इफेक्ट कहा जाता है।


जैसे-जैसे चंद्रमा धीरे-धीरे पृथ्वी से दूर होता गया, उसने हमारे ग्रह की घूर्णन गति को धीरे-धीरे धीमा कर दिया। इसका असर दिन की लंबाई पर पड़ा और वह धीरे-धीरे 24 घंटे तक पहुंच गई।


रोटेशन में बदलाव के पीछे के कारण


विज्ञान के अनुसार, दिन की लंबाई में बदलाव कई प्राकृतिक कारणों से आता है। इनमें प्रमुख हैं चंद्रमा और सूर्य के ज्वारीय प्रभाव, पृथ्वी के कोर और मेंटल के बीच की इंटरैक्शन (core-mantle coupling), और ग्रह पर मास यानी द्रव्यमान का वितरण। 


इसके अलावा, समय-समय पर आने वाले भूकंप, ग्लेशियरों के पिघलने और महासागरों की धाराओं में बदलाव भी पृथ्वी के घूमने की गति को प्रभावित करते हैं। जब-जब ग्रह के द्रव्यमान का संतुलन बदलता है, धरती की स्पिन में थोड़ा बदलाव आ सकता है।


कुछ विशेषज्ञों ने यह भी बताया है कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र और मौसमी बदलाव भी रोटेशन को प्रभावित करते हैं।


एक छोटे से बदलाव का असर धीरे-धीरे बढ़ता है और करोड़ों वर्षों में दिन की लंबाई में बड़ा अंतर बन जाता है।


यही कारण है कि 60 करोड़ साल पहले जहां एक दिन 21 घंटे का था, वहीं आज यह 24 घंटे का हो गया है।


2020 की चौंकाने वाली स्टडी


जहां एक ओर वैज्ञानिक लंबे समय से यह मानते रहे कि पृथ्वी की रोटेशन धीरे-धीरे धीमी हो रही है, वहीं 2020 में एक नई स्टडी ने सभी को चौंका दिया। इस रिपोर्ट में सामने आया कि पृथ्वी अब कुछ समय के लिए पहले से भी तेज घूमने लगी है।


यह तेजी पिछले 50 वर्षों की तुलना में अभूतपूर्व थी। इस बदलाव को अस्थायी माना जा रहा है, और वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका कारण हालिया दशकों में ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र स्तर में बदलाव, और उत्तर गोलार्ध में जल जमाव हो सकता है।


यह रोटेशन में तेजी मानव जीवन के पैमाने पर छोटा प्रतीत हो सकता है, लेकिन तकनीकी सिस्टमों के लिए इसका असर बड़ा हो सकता है।


इसलिए वैज्ञानिक इन परिवर्तनों को लगातार मॉनिटर कर रहे हैं, ताकि समय निर्धारण प्रणाली में आवश्यकतानुसार समायोजन किए जा सकें।


क्या होगा भविष्य में?


भविष्य को लेकर वैज्ञानिकों की राय स्पष्ट है। उनका मानना है कि भले ही फिलहाल कुछ दिनों के लिए पृथ्वी तेजी से घूम रही हो, लेकिन दीर्घकालिक प्रवृत्ति यही है कि पृथ्वी का रोटेशन धीरे-धीरे धीमा होता रहेगा।


इस रफ्तार में कमी के कारण आने वाले लाखों वर्षों में दिन और भी लंबे हो सकते हैं। हालांकि, यह परिवर्तन इतनी धीमी गति से होता है कि इसका असर महसूस करने में कई पीढ़ियां लग जाती हैं।


अभी हमें इसका दैनिक जीवन पर कोई खास असर नहीं दिखता, लेकिन तकनीकी प्रणाली जैसे GPS, स्मार्टफोन, सैटेलाइट, इंटरनेट टाइमिंग और बैंकिंग नेटवर्क्स इस सूक्ष्म समय बदलाव पर निर्भर होते हैं।


अगर धरती के समय में बड़ा बदलाव आता है, तो इन प्रणालियों को री-कैलिब्रेट करना पड़ सकता है।


हालांकि वैज्ञानिक इस पर पूरी तरह से नियंत्रण रखने में सक्षम हैं और उन्होंने ऐसे समय में लीप सेकंड जैसे समाधान अपनाए हैं।


क्या हमें चिंतित होना चाहिए?


सामान्य जनजीवन के लिए इस बदलाव का कोई तत्काल प्रभाव नहीं है। न ही हमें इस बात से घबराने की जरूरत है कि धरती अब पहले से तेजी या धीमी हो रही है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो लाखों वर्षों से चलती आ रही है।


जब तक यह बदलाव मानव गतिविधियों से प्रेरित न हो, यह चिंता का विषय नहीं है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जब तक समय के इन सूक्ष्म परिवर्तनों को सही ढंग से ट्रैक किया जाता रहेगा, तब तक हमारी तकनीकी दुनिया पर इसका असर सीमित रहेगा।


आप क्या सोचते हैं इस खबर को लेकर, अपनी राय हमें नीचे कमेंट्स में जरूर बताएँ।


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