ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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राज्यसभा चुनाव अक्सर सीधी जनता के वोट से नहीं, बल्कि विधानसभा की गणित से तय होते हैं. लेकिन इस बार बिहार, ओडिशा और हरियाणा की 11 सीटों पर हुए चुनाव ने सिर्फ गणित नहीं, राजनीतिक अनुशासन और टूटती एकजुटता को भी सामने ला दिया. सबसे बड़ा झटका विपक्ष को लगा, क्योंकि बिहार में NDA ने सभी 5 सीटों पर जीत दर्ज की और ओडिशा में क्रॉस वोटिंग ने पूरा खेल बदल दिया.
बिहार में विपक्ष की उम्मीदें क्यों टूटीं
बिहार में 5 सीटों के लिए 6 उम्मीदवार मैदान में थे. इनमें 5 उम्मीदवार NDA से थे और 1 उम्मीदवार महागठबंधन की तरफ से था. जीत के लिए 41 वोट जरूरी थे, और 243 सदस्यीय विधानसभा में NDA के पास 202 विधायक थे, यानी पांचवीं सीट के लिए उसे 3 वोट कम पड़ रहे थे. दूसरी तरफ महागठबंधन के पास 35 विधायक थे, और उसे जीत के लिए 6 अतिरिक्त वोटों की जरूरत थी.
शुरुआत में विपक्षी उम्मीदवार ए. डी. सिंह के लिए उम्मीद इसलिए बनी क्योंकि AIMIM के 5 और बसपा के 1 विधायक के समर्थन की बात सामने थी. लेकिन आखिरी समय में विपक्ष के 4 विधायक, जिनमें 3 कांग्रेस और 1 राजद विधायक शामिल थे, वोट डालने ही नहीं पहुंचे. पहली वरीयता से फैसला नहीं हुआ, तो दूसरी वरीयता की गिनती हुई और भाजपा के शिवेश राम जीत गए.
यही वह मोड़ था जहां महागठबंधन की रणनीति बिखरती दिखी. बाद में महागठबंधन ने भाजपा पर विधायकों को डराने, धमकाने और खरीद-फरोख्त का आरोप भी लगाया.
ओडिशा में कैसे पलटा पासा
ओडिशा में 4 सीटों के लिए 5 उम्मीदवार मैदान में थे और जीत के लिए 30 वोट जरूरी थे. भाजपा के मनमोहन सामल और सुजीत कुमार ने जीत दर्ज की, जबकि बीजद के संतरूप मिश्रा भी सफल रहे. सबसे बड़ा उलटफेर तब हुआ जब भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार दिलीप रे भी जीत गए.
यह परिणाम इसलिए चौंकाने वाला रहा क्योंकि बीजद और कांग्रेस के पास अपने संयुक्त उम्मीदवार दत्तेश्वर होता को जिताने लायक पर्याप्त वोट थे. लेकिन बीजद के 8 और कांग्रेस के 3 विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर दिलीप रे के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर दी. इसके बाद नवीन पटनायक ने भाजपा पर खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया और बागी विधायकों पर कार्रवाई की बात कही.
हरियाणा में मुकाबला कांटे का रहा
हरियाणा में 2 सीटों के लिए मतदान हुआ. यहां वोटिंग की गोपनीयता भंग होने की शिकायत के कारण मतगणना करीब 5 घंटे तक रुकी रही. आखिर में भाजपा के संजय भाटिया और कांग्रेस के कर्मवीर बौद्ध ने एक-एक सीट जीत ली. मतों की गिनती में संजय भाटिया को 31, कर्मवीर बौद्ध को 28 और निर्दलीय सतीश नांदल को 27 वोट मिले.
कांग्रेस उम्मीदवार कर्मवीर बौद्ध की जीत सिर्फ एक वोट से हुई. यह बताता है कि हरियाणा में मुकाबला कितना कड़ा था और एक भी वोट का कितना असर पड़ सकता है.
बड़ी तस्वीर क्या कहती है
इन नतीजों ने साफ दिखा दिया कि संख्या होने के बावजूद विपक्ष हर जगह अपने विधायकों को एकजुट नहीं रख पाया. दूसरी तरफ NDA ने वहां भी फायदा उठाया, जहां गणित पूरी तरह आसान नहीं था.
चुनाव आयोग ने पहले 10 राज्यों की 37 सीटों पर चुनाव की घोषणा की थी, जिनमें से 26 सीटों पर उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए थे. लेकिन जिन 11 सीटों पर मुकाबला हुआ, वहां का परिणाम बताता है कि असली लड़ाई सिर्फ वोट की नहीं, बल्कि संगठन और अनुशासन की भी थी. इस चुनाव ने विपक्ष के सामने यह सवाल और बड़ा कर दिया है कि चुनावी मुकाबले में केवल गठबंधन काफी नहीं, अंदरूनी एकजुटता उससे भी ज्यादा जरूरी होती है.
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