दिल्ली का विकास करने से रेखा सरकार को रोक रहे ये 6 असली झंझट!
रेखा गुप्ता की नई सरकार से दिल्ली को बड़ी उम्मीदें हैं। लेकिन अवैध कॉलोनियां, झुग्गियां, आधारभूत समस्याएं और अधूरे मास्टर प्लान, ये सब बने हैं राजधानी के विकास की बड़ी रुकावटें।
दिल्ली का विकास करने से रेखा सरकार को रोक रहे ये 6 असली झंझट!
  • Category: दिल्ली NCR

अगर आप पुरानी फिल्मों और गानों में रूचि रखते हैं तो आपको 1958 की मशहूर फिल्म ‘फिर सुबह होगी’ का गीत तो याद ही होगा, “वो सुबह कभी तो आएगी…”।


अब लगता है, वो सुबह दिल्ली की सियासत में आखिरकार आ ही गई, 27 साल बाद बीजेपी ने राजधानी में सत्ता का स्वाद चखा है।


मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने शपथ लेते ही एक्शन मोड में आकर यमुना आरती और कैबिनेट मीटिंग जैसे प्रतीकात्मक कदम भी उठाए, जिससे ये संकेत दिया गया कि बदलाव की शुरुआत हो चुकी है।


लेकिन, गौर करने वाली बात ये है कि सिर्फ तस्वीरें और घोषणाएं ही काफी नहीं होतीं। असली चुनौती तो दिल्ली को सचमुच “विकसित राजधानी” बनाने की है, और इसके रास्ते में ऐसी कई बाधाएं हैं, जिन्हें हटाए बिना “सुबह की ताजगी” सिर्फ एक भ्रम बनकर रह जाएगी।


अवैध कॉलोनियां: दिल्ली के विकास की सबसे बड़ी उलझन


दरअसल, दिल्ली में जितनी तेजी से जनसंख्या बढ़ी, उतनी ही तेजी से अवैध कॉलोनियों की संख्या भी बढ़ती चली गई।


आज भी राजधानी में 1,700 से ज्यादा ऐसी कॉलोनियां हैं, जहां न सड़कें ठीक हैं, न सीवर लाइन, न जलापूर्ति पक्की है और न बिजली का ठीक-ठाक ढांचा।


दिलचस्प बात ये है कि दिल्ली का सबसे बड़ा वोटबैंक यहीं बसता है, मध्यवर्ग, जो मजबूरी में इन कॉलोनियों में जीवन बसर कर रहा है।


इन कॉलोनियों को नियमित करने की प्रक्रिया 1977 से जारी है, लेकिन अब तक आधे से ज्यादा काम अधूरा है।


रेखा गुप्ता सरकार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या ये अवैध कॉलोनियां कभी असली विकास देख पाएंगी?


झुग्गियां: जहां अब भी सिर्फ सपनों का बसेरा है


इसके अलावा, राजधानी की झुग्गी बस्तियां भी एक और बड़ी चुनौती हैं। यहां आज भी करीब 20 लाख लोग रहते हैं, जो या तो घरेलू नौकर हैं या दिहाड़ी मजदूर।


“जहां झुग्गी, वहां मकान” योजना के तहत कुछ कदम जरूर उठाए गए, लेकिन अब भी ये संख्या ऊंट के मुंह में जीरे जैसी है।


प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 1600 परिवारों को घर मिलना शुरुआत तो है, पर खत्म नहीं। जब तक इन मलिन बस्तियों को पक्के आवास में नहीं बदला जाएगा, तब तक दिल्ली को “कॉस्मोपॉलिटन” कह पाना मुश्किल है।


अव्यवस्थित आधारभूत ढांचा: राजधानी या कस्बा?


वैसे तो राजधानी होने के नाते दिल्ली से उम्मीद होती है कि वो हर मायने में ग्लोबल शहर जैसी दिखे। लेकिन हकीकत कुछ और कहती है।


  • पानी की मांग 129 करोड़ गैलन, आपूर्ति सिर्फ 96.9 करोड़

  • हर बारिश में सड़कें तालाब बन जाती हैं

  • बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है लेकिन वितरण नेटवर्क जर्जर है

  • यातायात व्यवस्था, खासकर पूर्वी और दक्षिणी दिल्ली में, पूरी तरह चरमराई हुई है


दिल्ली जल बोर्ड की हालिया रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली हरियाणा, यूपी और पंजाब से पानी मांगती है।


रेखा गुप्ता खुद हरियाणा से आती हैं, ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि उनके राज्य से सहयोग कितना मिलता है।


क्या मास्टर प्लान 2041 से दूर होंगी दिल्ली की मुश्किलें?


एक और पहलू ये है कि डीडीए का मास्टर प्लान 2041 तैयार है, जिसमें 20 साल में पूरी राजधानी का कायाकल्प करने की बात है।


लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि अभी तक प्लान 2021 भी पूरी तरह लागू नहीं हो पाया।


वहीं, 2041 मास्टर प्लान की बात करें तो इसमें कई बेहतरीन बातें शामिल हैं, जैसे कि:


  • ग्रीन एरिया का विस्तार

  • जल संरक्षण

  • मिक्स लैंड यूज़

  • पीने के पानी की पुख्ता योजना

  • आवागमन को आसान बनाना


पर फिर अब असली सवाल ये है कि क्या इन सब पर ठोस अमल हो पाएगा? या फिर ये प्लान भी सिर्फ फाइलों में ही सिमट जाएगा?


धार्मिक स्थल और राजनीतिक अड़चनें


इसके अलावा, विकास के रास्ते में कानूनी पेच और धार्मिक आस्थाएं भी रुकावट बनती हैं।


भजनपुरा, मौजपुर, कस्तूरबा नगर जैसे इलाकों में सड़क किनारे बने धार्मिक स्थल ट्रैफिक और अव्यवस्था की बड़ी वजह हैं।


लेकिन इन्हें हटाना इतना आसान भी नहीं, क्योंकि मामला सीधे-सीधे लोगों की आस्था से जुड़ा है।


वादों का अमल: पहली परीक्षा


हालांकि, रेखा गुप्ता सरकार ने पहले ही दिन ये साफ कर दिया था कि 300 यूनिट फ्री बिजली, 20 हजार लीटर पानी, ₹5 में अटल कैंटीन, महिलाओं को ₹2500, और बसों में मुफ्त यात्रा जैसे वादों को निभाया जाएगा।


मगर, इन्हें पूरा करना एक तरफ और विकास के असली एजेंडे पर डटे रहना दूसरी तरफ।


मुफ्त योजनाएं तत्काल राहत तो देती हैं, लेकिन अगर मूलभूत ढांचे में सुधार नहीं हुआ, तो नई सुबह की रौशनी फिर पुराने अंधेरों में डूब सकती है।


अब इरादों को जमीनी हकीकत में बदलने की बारी


इसमें कोई दोराय नहीं कि रेखा गुप्ता के आने से दिल्ली में राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं, लेकिन राजधानी की किस्मत बदलने के लिए केवल इरादे नहीं, ठोस क्रियान्वयन, पारदर्शिता और तेज़ फैसलों की जरूरत है।


नई सरकार को अब “विकसित दिल्ली” का खाका खींचने के साथ-साथ उसे सही समय पर रंगों से भरने की भी जिम्मेदारी उठानी होगी।


आप क्या सोचते हैं इस खबर को लेकर, अपनी राय हमें नीचे कमेंट्स में जरूर बताएँ।

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