ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
गुजरात के भरूच ज़िले में गंभीरा नदी पर बना पुल गिर गया और इस हादसे में 15 लोगों की जान चली गई। यह वही पुल है जिसे 1985 में बनाया गया था और कहा गया था कि ये 100 साल तक चलेगा।
लेकिन महज 40 साल में इसके गिरने ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, क्या वाकई ब्रिज 100 साल तक टिकते हैं? पुल की उम्र कैसे तय होती है? और ये कैसे पता चलता है कि अब वो सेफ नहीं रहा?
इस आर्टिकल में हम इन्हीं सवालों के आसान और बैलेन्स्ड तरीक़े से जवाब देने की कोशिश करेंगे ताकि आपको सही और सिंपल जानकारी मिले।
ब्रिज की उम्र कैसे तय होती है?
किसी भी ब्रिज (चाहे वो नदी पर बना हो या हाईवे पर) की उम्र उसके बनने से पहले ही तय की जाती है।
ये तय करने में कई चीज़ें देखी जाती हैं, जैसे कि कौन सी मटीरियल से बना है (स्टील, कंक्रीट आदि), वहां का मौसम कैसा रहता है, पानी का बहाव कैसा है, ज़मीन कितनी मजबूत है, और ट्रैफिक कितना होगा।
आमतौर पर रेलवे ब्रिज को 100 साल के लिए डिज़ाइन किया जाता है और रोड ब्रिज को 50-60 साल के लिए।
पर ध्यान रखने वाली बात यह है कि ये "संभावित उम्र" होती है, यानी अगर ठीक से रखरखाव होता रहे, तो ब्रिज 100 साल तक चल सकता है।
IIT रुड़की से पढ़े सिविल इंजीनियर और 30+ देशों में काम कर चुके मनीष खिलौरिया के मुताबिक अगर ब्रिज का डिजाइन सही हो, उसकी क्वालिटी का ध्यान रखा जाए और टाइम से मेंटेनेंस होता रहे, तो वो अपनी तय उम्र तक आराम से टिक सकता है।
ब्रिज की उम्र पूरी हो गई है या नहीं, कैसे पता चलता है?
ये पता लगाने के लिए कई तरह की टेक्निकल जांच और फिज़िकल इंस्पेक्शन होते हैं। हर कुछ साल में ब्रिज की हेल्थ जांची जाती है, इसे ब्रिज इंस्पेक्शन कहा जाता है।
इसमें देखा जाता है कि कहीं कोई क्रैक (दरार) तो नहीं, कोई हिस्सा जंग से खराब तो नहीं हो रहा, ब्रिज झुक तो नहीं रहा, नींव धंस तो नहीं रही, खंभों या रेलिंग में टूट-फूट तो नहीं है।
अगर किसी ब्रिज के कंक्रीट में दरार आ जाए, स्टील जंग लगने लगे या उसकी लोडिंग कैपेसिटी (वज़न सहने की ताकत) घटने लगे, तो इसे रेड फ्लैग माना जाता है और ऐसे ब्रिज की या तो मरम्मत होती है या उसे बंद कर दिया जाता है।
अगर किसी जगह बाढ़, भूकंप या कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा आई हो, तो वहां के ब्रिज की जांच तुरंत होती है।
अगर इंजीनियर्स को लगे कि ब्रिज सेफ नहीं है, तो उसे "आउट ऑफ सर्विस" यानी इस्तेमाल से बाहर कर दिया जाता है।
ब्रिज को डिज़ाइन कैसे किया जाता है?
ब्रिज बनाने से पहले एक डीपीआर (Detailed Project Report) बनती है जिसमें बहुत सारी चीजें देखी जाती हैं:
ये ब्रिज क्यों बन रहा है?
कितनी गाड़ियां/ट्रेनें रोज़ गुज़रेंगी?
ज़मीन की हालत कैसी है?
मौसम, तापमान, बारिश और बाढ़ का इतिहास क्या है?
भूकंप का खतरा कितना है?
इन सभी बातों को ध्यान में रखकर फिर उसका डिज़ाइन और मटीरियल तय किया जाता है, जैसे स्टील ब्रिज, कंक्रीट ब्रिज, आर्च ब्रिज, बीम ब्रिज आदि।
फिर मेंटेनेंस और मरम्मत का भी सालाना प्लान तैयार किया जाता है ताकि ब्रिज लंबे समय तक सेफ और मज़बूत बना रहे।
भारत के कुछ सबसे पुराने और अब भी चालू ब्रिज कौन से हैं?
भारत में कई ऐसे ब्रिज हैं जो 100 साल से भी ज्यादा पुराने हैं और आज भी इस्तेमाल में हैं। जानिए कुछ बड़े नाम:
नैनी ब्रिज, प्रयागराज (1865): 1000 मीटर लंबा यह ब्रिज अब भी ट्रेन और छोटे वाहनों के लिए चालू है।
हावड़ा ब्रिज (1874): कोलकाता का सबसे आइकॉनिक ब्रिज जो आज भी फुल ट्रैफिक को झेल रहा है।
कानपुर गंगा ब्रिज (1875): इस पर पहले ट्रेनों और गाड़ियों दोनों की आवाजाही होती थी।
बारापुला पुल, दिल्ली (1628): मुगलकाल में बना यह पुल आज भी सही हालत में है।
लोहे का ब्रिज, दिल्ली (1866): भारत का पहला बड़ा आयरन रेलवे ब्रिज।
गोल्डन ब्रिज, गुजरात (1881): भरूच में बना यह ब्रिज अभी भी गाड़ियों के लिए खुला है।
शाही पुल, जौनपुर (1564): 450 साल पुराना यह पुल आज भी हल्के वाहनों के लिए इस्तेमाल हो रहा है।
नामदांग ब्रिज, असम (1703): एक ही बड़े पत्थर से बना यह पुल अब भी मजबूत है।
मजेदार बात ये है कि अकेले भारतीय रेलवे के पास 38,000 से ज्यादा ऐसे ब्रिज हैं जिनकी उम्र 100 साल से ऊपर है, और ये अब भी चल रहे हैं।
कुल मिलाकर किसी भी ब्रिज की उम्र सिर्फ प्लानिंग से नहीं, उसकी देखरेख और मरम्मत से तय होती है।
अगर सही वक्त पर जांच होती रहे, दिक्कत दिखने पर मरम्मत हो जाए और ओवरलोडिंग न हो, तो कोई भी पुल 100 साल आराम से निकाल सकता है।
लेकिन जैसे ही मेंटेनेंस में लापरवाही होती है, ब्रिज की उम्र घट जाती है और हादसे की आशंका बढ़ जाती है। गुजरात का हादसा इसी लापरवाही की एक चेतावनी है।
आप क्या सोचते हैं इस खबर को लेकर, अपनी राय हमें नीचे कमेंट्स में जरूर बताएँ।
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