तमिलनाडु का ‘मोदी’? जानिए कौन हैं उपराष्ट्रपति पद के दावेदार CP राधाकृष्णन
तमिलनाडु की राजनीति में सी.पी. राधाकृष्णन को अक्सर ‘मोदी ऑफ़ तमिलनाडु’ कहा जाता है। उपराष्ट्रपति पद के संभावित दावेदारों की सूची में उनका नाम चर्चा में है।
तमिलनाडु का ‘मोदी’? जानिए कौन हैं उपराष्ट्रपति पद के दावेदार CP राधाकृष्णन
  • Category: राजनीति

नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी ने वरिष्ठ नेता और तमिलनाडु के दिग्गज कार्यकर्ता सी.पी. राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है। इस ऐलान के बाद से देशभर में उनके जीवन से जुड़े किस्से और संघर्षों की चर्चा तेज हो गई है। बता दें, राधाकृष्णन का राजनीतिक सफर बेहद दिलचस्प रहा है—कभी वे 16 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े साधारण कार्यकर्ता थे, और आज वे देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद की दौड़ में हैं।

 बचपन और RSS से जुड़ाव

 दरअसल सी.पी. राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के कोयंबटूर में हुआ। किशोरावस्था में ही उन्हें RSS की विचारधारा ने प्रभावित किया। महज़ 16 साल की उम्र में उन्होंने संघ की शाखाओं में जाना शुरू किया और संघ के प्रचारक के तौर पर समाजसेवा और संगठन निर्माण में जुट गए। यही अनुभव आगे चलकर उनके राजनीतिक करियर की मजबूत नींव बना।

 ‘तमिलनाडु का मोदी’ क्यों कहते हैं समर्थक?

 राधाकृष्णन को उनके समर्थक प्यार से ‘तमिलनाडु का मोदी’ भी कहते हैं। वजह यह है कि उनका व्यक्तित्व और कार्यशैली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से काफी हद तक मिलती-जुलती बताई जाती है। सादगी, संगठन पर पकड़ और लंबे समय तक बिना रुके मेहनत करना—ये सभी गुण उनमें देखे जाते हैं। इसके अलावा, राधाकृष्णन का राजनीतिक सफर भी संघर्षों से भरा रहा है। उन्होंने जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत किया और बिना किसी बड़े राजनीतिक परिवार से आए हुए भी भाजपा में ऊंचा मुकाम हासिल किया। यही वजह है कि कार्यकर्ता उन्हें मोदी का प्रतिबिंब मानते हैं।

 राजनीतिक करियर की शुरुआत

 जानकारी के लिए आपको बता दें की, जब 90 के दशक में भाजपा ने तमिलनाडु में अपनी पकड़ बनाने की कोशिशें तेज कीं थी, तो इसी दौरान राधाकृष्णन ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने कोयंबटूर सीट से जीत हासिल की। यह उपलब्धि आसान नहीं थी, क्योंकि उस दौर में तमिलनाडु भाजपा का गढ़ नहीं माना जाता था।

 हलाकि कोयंबटूर बम धमाकों (1998) के बाद जब पूरा शहर दहशत में था, तो राधाकृष्णन ने वहां लोगों के बीच जाकर न केवल विश्वास बहाल किया बल्कि हिंदू समुदाय के बीच भाजपा की पकड़ भी मजबूत की। दरअसल राजनीतिक जीवन में राधाकृष्णन को विवादों और कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा। 1998 में कोयंबटूर में हुए बम धमाकों में भाजपा की रैली को निशाना बनाया गया था। उस घटना में 50 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। उस समय राधाकृष्णन वहां मौजूद थे और हमले से बाल-बाल बचे। इस घटना ने उनके राजनीतिक करियर को और ज्यादा मजबूती दी क्योंकि लोगों ने उन्हें एक निडर नेता के रूप में देखना शुरू किया।

 संगठन में योगदान

 वही भाजपा ने दक्षिण भारत में अपनी जड़ें जमाने के लिए कई प्रयोग किए और इनमें राधाकृष्णन की भूमिका अहम रही। वे लंबे समय तक भाजपा तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष रहे। हालांकि कई बार हार देखने के बावजूद उन्होंने संगठन को संभाले की पूरी कोशिश की। और उनकी संगठन क्षमता का ही ये परिणाम था कि भाजपा धीरे-धीरे तमिलनाडु में अपनी एक पहचान बना सकी। इसलिए भले ही आज भाजपा वहां सबसे बड़ी पार्टी न हो, लेकिन उसके वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी और कार्यकर्ताओं का जोश राधाकृष्णन जैसे नेताओं की मेहनत का ही परिणाम है।

 सादगी और जीवनशैली

 आपको बता दें, राधाकृष्णन अपनी सादगी और सरल स्वभाव के लिए भी जाने जाते हैं। कहा जाता है कि वे तमिल संस्कृति और परंपराओं से गहराई से जुड़े हुए हैं। उनका जीवन बेहद साधारण है और वे कार्यकर्ताओं के बीच घुल-मिलकर काम करने में विश्वास रखते हैं।

 उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी

 अब भाजपा ने जब उन्हें उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया तो यह तमिलनाडु के कार्यकर्ताओं के लिए गर्व का क्षण बन गया। क्योंकि दक्षिण भारत से आने वाले नेताओं को राष्ट्रीय राजनीति में अक्सर ज्यादा जगह नहीं मिलती, लेकिन राधाकृष्णन की उम्मीदवारी इस मायने में खास है।

 राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने यह कदम उठाकर दक्षिण भारत को साधने की रणनीति बनाई है। यह संदेश देने की कोशिश है कि पार्टी केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश का प्रतिनिधित्व करना चाहती है।

 समर्थकों की उम्मीदें

 राधाकृष्णन के समर्थक और सहयोगी उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं, जिसने कठिनाइयों के बावजूद पार्टी का झंडा ऊंचा रखा। वे मानते हैं कि अगर राधाकृष्णन देश के उपराष्ट्रपति बनते हैं तो यह केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि तमिलनाडु और पूरे दक्षिण भारत के लिए एक गौरव का क्षण होगा।

 

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